एक घायल पक्षी की आत्मकथा - Ak Ghayal Pakshi Ki Atmakatha

 नमस्कार दोस्तों आपका दिल से स्वागत हे तो आज हम एक घायल पक्षी की आत्मकथा के बारे में बात करने वाले हे कैसे वो पक्षी घायल होता हे कैसे वो पहले और अब ज़िन्दगी को बिताता हे उसने क्या - क्या सपने देखे थे और क्या हो गया ये सब हम इस पोस्ट के माध्यम से आपको बताने वाले हे हमें उम्मीद हे की आपको ये पोस्ट जरूर पसंद होगी। 

ak ghayal pakshi ki atmakatha

एक घायल पक्षी की आत्मकथा

 प्रस्तावना : 

           जी हां दोस्तों में एक घायल पक्षी हु आज जो मेरा ये हाल हे उसके पीछे एक शरारती लडके का हाथ हे उसकी एक छोटी सी भूल की वजह से मेरा ये हाल हे मेरे पंख जो मुझे बहुत ही प्यारे थे वो ही आज मेरे पास नहीं हे मेरे शरीर से खून बह रहा हे पता नहीं कब मेरी मौत हो जाये और में इस पीड़ा से आज़ाद हो जाऊ इसलिए में मरने से पहले में आपको अपने बारे में आपको बताना चाहता हु।

मेरा बचपन : 

  मेरे बचपन के दिन बहुत ही सुहाने थे एक बड़ा सा बरगद के पेड़ पर हमारा घोंसला था जिसमे मेरे छोटे भाई - बहन और में रहते थे यानिकि मेरा परिवार बहुत छोटा था मेरे माँ हमें छोड़कर दाने लेने जाती हम तीनो भाई - बहन अपनी माँ की राह देखते और उसके वापस आते देखकर हमारी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। हम अपनी - अपनी चोंच खोल देते और माँ उसमे दाने डालती उसी प्रकार हर दिन माँ हमारे लिए दाने लेने जाती और हमारा भरण पोषण करती इसी प्रकार दिन बीतते गए और हम बड़े होते गए। 

मेरे सुनहरे पल 

  जब हम बड़े हुए तो हमारी भी इच्छा हुई उड़ने की तो माँ ने हमको उड़ना सिखाया तब में और मेरे भाई बहन शरुआत में एक डाल से दूसरी डाली पर जाते कभी कभी गिर भी जाते थे ऐसे कर कर के हमने उड़ना सिख लिए अब हम ऊँची आकाश में उड़ सकते हे किसी भी पेड़ पर आसानी से बैठ सकते हे यानिकि उड़ने हम माहिर हो गए थे।

अब हम तीनो भाई - बहन दूर - दूर की सैर करने लगे। मनचाहे पेड़ो पर बैठकर मनचाहे फल खाते बड़े और ऊँचे झरनों का मीठा पानी पीते मौज मस्ती करते ये मेरे जीवन के सुनहरे दिन थे। 

मेरा घायल होना 

  एक दिन की बात हे हम दिनों भाई - बहन हर दिन की तरह सैर करने गए थे अपने मनचाहे फल खाकर आराम के लिए हम एक आम के पेड़ पर बैठे थे तभी तीन लड़के आम खाने के लिए उस आम के पेड़ के निचे आये उसमे से एक शरारती लडके ने एक वज़नदार पथ्थर उठाकर आम की तरफ फेंका लेकिन बदनसीब उस आम की पीछे ही हम दिन भाई - बहन बैठे थे वो पथ्थर मुझे लगा और मेरे पंख से खून बहने लगा में घायल होकर निचे गिर गया मेरे भाई बहन मुझे छोड़कर चले गए तब से में यही पे रहता हु और अपनी मौत का इंतजार करता हु क्योकि अब में पहले की तरह उड़ नहीं सकता जिसकी वजह से आज में अन्य पक्षी को उड़ते हुए देखकर मुझे बहुत कष्ट होता हे मेरा दर्द केवल में समझ सकता हु। 

मौत का इंतजार करना 

अब मुझे अपना अंत बहुत ही नज़दीक लग रहा हे क्योकि मेरे पंख की वजह से में उड़ नहीं सकता जिसे मुझे खाना भी नसीब नहीं होता। अब मुझे सिर्फ मौत का इंतजार हे मरने के बाद में फिर से में पक्षी ही बनना चाहता हु क्योकि स्वतंत्रता का सच्चा सुख पक्षी ही भोगते हे। 

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" मेरे प्रति हमदर्दी के लिए आपका दिल से धन्यवाद " 

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